MANGOMAN INDIA FOUNDATION

Tuesday, 6 May 2014

बिक गयी है धरती , गगन बिक न जाए , बिक रहा है पानी,पवन बिक न जाए , चाँद पर भी बिकने लगी है जमीं ., डर है की सूरज की तपन बिक न जाए , हर जगह बिकने लगी है स्वार्थ नीति, डर है की कहीं धर्म बिक न जाए , देकर दहॆज ख़रीदा गया है अब दुल्हे को , कही उसी के हाथों दुल्हन बिक न जाए , हर काम की रिश्वत ले रहे अब ये नेता , कही इन्ही के हाथों वतन बिक न जाए , सरे आम बिकने लगे अब तोह सांसद , डर है की कहीं संसद भवन बिक न जाए , आदमी मरा तोह भी आँखें खुली हुई हैं डरता है मुर्दा , कहीं कफ़न बिक न जाए.


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